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कर्मयोगी भगवान कृष्ण के सार

गीता ज्ञानसागर

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत” |
“अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्” ||

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Paramguhya Gyan

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।9.28।।

कर्म के फल और बन्धन से, इस तरह मुक्त हो जाओगे । संन्यासयोग के योगी बन, विमुक्त हो मुझको पाओगे ।। 9.28 ।।

9.28 Thus shalt thou be freed from the bonds of actions yielding good and evil fruits; with the mind steadfast in the Yoga of renunciation, and liberated, thou shalt come unto Me.

Gita ka Sar

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।

पाप-पुण्य दोनों से मुक्ति, बुद्धियोग से मिल जाती है | अत: तुम योग में लगे रहो, कर्मों का कौशल योग ही है || 2.50 ||

2.50 Endowed with wisdom (evenness of mind), one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote thyself to Yoga; Yoga is skill in action.

Bhagwat Gyan

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।।

ज्ञानी बहुत जन्मों के बाद, मुझको हासिल कर लेता है | माने सब कुछ वासुदेव हैं, वह सज्जन दुर्लभ होता है ।। 7.19 ।।

7.19 At the end of many births the wise man comes to Me, realising that all this is Vaasudeva (the innermost Self); such a great soul (Mahatma) is very hard to find.

Bhagwat Gyan

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।7.28।।

जिनके पापों का अन्त हुआ, जिनके कर्म पुण्य होते हैं | वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त हुये, दृढ़व्रत से मुझे भजते हैं ।। 7.28 ।।

7.28 But those men of virtuous deeds whose sins have come to an end, and who are freed from the delusion of the pairs of opposites, worship Me, steadfast in their vows.

Bhagwat Gyan

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।7.27।।

राग-द्वेष से जो पैदा हो, मोहित होकर उसी द्वन्द्व से । सम्मोहित रहें जन्म से ही, अर्जुन, समस्त प्राणी जग के ।। 7.27 ।।

7.27 By the delusion of the pairs of opposites arising from desire and aversion, O Bharata, all beings are subject to delusion at birth, O Parantapa.

Dhyaanyog

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।6.46।।

तपस्वियों से बढकर योगी, ज्ञानियों से श्रेष्ठ है योगी । कर्मियों से बेहतर योगी, अर्जुन तुम अत: बनो योगी ।। 6.46 ।।

6.46 The Yogi is thought to be superior to the ascetics and even superior to men of knowledge (obtained through the study of scriptures); he is also superior to men of action; therefore be thou a Yogi, O Arjuna.

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